कभी कभी यूंही प्रकृति पर विचार आते है मेरे स्वच्छनद मन उपवन में, वास्तविकता बनकर ....जैसे इंसान और पत्तों में कोई भेद नहीं ...
जब देखता हूं खुद का 'अक्स' उन टूटे पत्तों में ,जो कभी अपनी शाख पर लहराते थे हरित वरदान बनकर....
वो मोती सी ओंस की बूंदे, मेरे तन मन पर सुशोभित थी चमचमाकर ।।
जानता हूं आज मेरा कोई वजूद नहीं ।। मै अपने रहनुमा नीगेबान के करीब नहीं ।।
ज़मींदोज़ हूं धूमिल माटी में , निश्चल सिमटकर.....
फिर भी जाने क्यों , एक आस है अभी ज़िंदा , के फिर से आएगी वोही नवपोशित पीढ़ी उभरकर....
सूक्ष्म कोंपले ,नवपुलकित फलों से परिपूर्ण होकर....
खिलेंगी कलियां , फिर से बहार बनकर...
देंगे ज़माने को फिर से वोही बेमिसाल खुशियां , हम साया बनकर !!
और झूमेंगा फिर से मेरा अंतर्मन भी , मेरे माही वृक्ष के साथ...
बनकर रहबर !!
बनकर हमसफ़र !!🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃
~आपका अरुण शर्मा "अक्स'